मित्र !!!!
तुम फिर आओगे
पूछोगे अनेको प्रश्न
निरुतर रहूंगी मैं.....
क्यूंकि तुम्हारे और मेरे
मध्य खड़ा है अंतर का एक महासागर
न तुम पार कर पाओगे और न मैं....
तुम्हारी आँखों मैं जाग्रत होगी
एक विवश कोमलता
पर मैं प्रत्युतर नहीं दे पाऊँगी
शुक्र है तुम्हारा की तुम
श्रम कानून का दर्द नहीं हो....
पर तुम .....
मेरी परवाह मत करना
क्यूंकि सदा की तरह
मुझे ढूँढनी है कुढ़े के ढेर से
भूख न लगने की संजीविनी
और हर दिन खेलना है
एक अंत हीन खेल
कुढ़े से रोटी बिननेका
मुझे तो रात गए देर तक
रोज सुननी है भूख की लोरिया जहाँ
माँ की जगह अदृश्य रोटिया गाती है ....
और देखने हैं दिवास्वप्न...
अपने सर्द स्याह बचपन के .....
न चाहते भी रोकना है हर दिन
बचपन के मोड़ पर खड़े
उस विवश आंसू को ...
तुम
मेरी परवाह मत करना
क्योंकि तपती दोपहरिया मैं
कूड़े से बीनकर लायी
प्लास्टिक की बोतल से
पी लूंगी पानी
और चबा लूंगी कुछ चबेने
तुम तो
मलोगे एक दिन अबीर और गुलाल
ढोल की थाप पर ...
नाचेंगे तुम्हारे अल्हढ़ मदमस्त पाँव
जबकि मेरे चेहरे पर नाचेगी
गर्द और धूल
और मेरे आँगन में ....
एक अभिशप्त
अंतहीन उदास ....
भूख की होली
सदा खेली जाएगी
हो सकता है .....
तुम्हे मिलते हो
हर जगह भगवान....
मुझे तो जाना है ...
अपने उसी मंदिर
कूड़े के ढेर पर
जहाँ मेरा ...
अन्नदाता भगवान बैठा है....
इसलिए ..
मेरे सपनो के राजकुमार
अपने उस
सुन्दर पहाढ़ से उतर कर
कभी मत आना ...
नदिया के इस पार .......
स्वरचित ..श्रीप्रकाश डिमरी ०१ मार्च २०१०

17 comments:
नाचेंगे तुम्हारे अल्हढ़ मदमस्त पाँव
जबकि मेरे चेहरे पर नाचेगी
गर्द और धूल
और मेरे आँगन में ....
एक अभिशप्त
अंतहीन उदास ....
भूख की होली
सदा खेली जाएगी ...
बहुत मार्मिक प्रस्तुति...संवेदनशील प्रस्तुति ने निशब्द कर दिया..दुःख होता है कि आजादी के इतने साल बाद भी आज बचपन कुडेदानों में रोटी ढूंड रहा है...बहुत सुन्दर और मर्मस्पर्शी..
मुझे ढूँढनी है कुढ़े के ढेर से
भूख न लगने की संजीविनी
और हर दिन खेलना है
एक अंत हीन खेल
कुढ़े से रोटी बिननेका
मुझे तो रात गए देर तक
रोज सुननी है भूख की लोरिया जहाँ
माँ की जगह अदृश्य रोटिया गाती है ....
आपकी पंक्तियाँ निशब्द कर देने वाली हैं....... बेहतरीन
हकीकत भी और हमारी व्यवस्था पर सटीक कटाक्ष भी.......
बेहद सुन्दर रचना ...पर क्या बात है... लिंक के रूप में डाली है.. सादर
बहुत ही सुंदर....
अच्छा लगा पढ़कर
आपको फॉलो भी कर लिया है...
नूतन जी ...आपका अभिनन्दन....सिस्टम और मेरी सम्मिलित त्रुटि से ऐसा हुआ....
सुंदर शब्द दिए हैं मन के अंतर्द्वंद को...... अच्छी लगी रचना
बेहद सुन्दर रचना| धन्यवाद|
कल 07/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!
सोचने पर मजबूर करती रचना ...मार्मिक
कल 04/10/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!
रोज सुननी है भूख की लोरिया जहाँ
माँ की जगह अदृश्य रोटिया गाती है ....
अद्भुत संवेदनशील रचना...
साधुवाद इस प्रस्तुति के लिए...
सादर...
bhaut hi khubsurat rachna....
यशवंत जी , मिश्रा जी , सागर जी , वंदना जी , शर्मा जी , डा० मोनिका जी डा० नूतन जी , वीणा जी , patali villge ji,आप सभी को कोटि नमन !! शुभ कामनाएं !!!
बहुत मार्मिक चित्रण ... बहुत ही बेहतरीन रचना.
अच्छी रचना पर बदायूं के नाते डबल बधाई !
:)
बहुत सुंदर रचना
अंतस की गहराइयों से उठे भाव
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